पितृपक्ष 2018 : 24 सितंबर से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध! जानिए क्या है इसका महत्व

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पितृपक्ष 2018 : 24 सितंबर से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध! जानिए क्या है इसका महत्व

Father’s Day 2018: Starting from September 24, Shraddha! Know what it is (21 सितंबर, 2018) : इस बात को हम भलिभांति जानते हैं कि भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक 15 दिन की विशेष अवधि में ‘श्राद्ध’ कर्म किए जाते हैं. श्राद्ध को ‘पितृपक्ष’ और ‘महालय’ नाम से भी जानते हैं. इस बार यह 24 सितंबर से 8 अक्टूबर तक रहेंगे. शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष के दिनों में हमारे पूर्वज जिनका देहान्त हो चुका है वे सभी पृथ्वी पर सूक्ष्म रूप में आते हैं और पृथ्वी लोक पर जीवित रहने वाले अपने परिजनों के तर्पण को स्वीकार करते हैं.

पितृपक्ष 2018 : 24 सितंबर से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध! जानिए क्या है इसका महत्व

श्राद्ध क्या होते हैं?

श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों को प्रसन्न करना होता है.  हिन्दू मान्यताओं के अनुसार जिस किसी के परिजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं, उनकी तृप्ति और उन्नति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, उसे ‘श्राद्ध’ कहा जाता है. साथ ही यह भी माना जाता है कि मृत्यु के देवता ‘यमराज’ श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें.

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किन्हें कहा जाता है पितर

किसी के भी परिजन चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित हों, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष उनकी मृत्यु हो जाती है, उनको ‘पितर’ कहा जाता है. पितृपक्ष में मृत्युलोक से पितर पृथ्वी पर आते है और अपने परिवार के लोगों को आशीर्वाद दिया करते हैं. पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए उनको तर्पण किया जाता है. पितरों के प्रसन्न होने पर घर पर सुख शान्ति आती है.

पितृपक्ष 2018 : 24 सितंबर से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध! जानिए क्या है इसका महत्व

पितृपक्ष का योग कब बनता है?

हिन्दू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है. पितृपक्ष के 15 दिन पितरों को समर्पित होता है. हिन्दू शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध पक्ष भाद्रपक्ष की पूर्णिणा से आरम्भ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक रहते हैं. भाद्रपद पूर्णिमा को उन्हीं का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन वर्ष की किसी भी पूर्णिमा को हुआ हो. शास्त्रों के अनुसार साल के किसी भी पक्ष में, जिस तिथि को परिजन की मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध कर्म उसी तिथि को करना चाहिये.

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श्राद्ध की तिथि जब ध्यान न हो

पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति प्राप्त होती है. जिस तिथि पर हमारे परिजनों की मृत्यु होती है उसे श्राद्ध की तिथि कहते हैं. बहुत से लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि याद नहीं रहती ऐसी स्थिति में शास्त्रों में इसका भी हल बताया गया है. शास्त्रों के अनुसार अगर किसी को अपने पितरों के मृत्यु की तिथि याद नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है. यही कारण है कि इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है. साथ ही किसी की अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है. ऐसे ही पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करने की मान्यता है.

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किसको श्राद्ध करना चाहिए?

श्राद्ध का अधिकार पुत्र को मिलता है, परंतु  अगर पुत्र जीवित न हो तो पौत्र, प्रपौत्र या विधवा पत्नी भी श्राद्ध कर सकती है. पुत्र के न रहने पर पत्नी का श्राद्ध पति भी कर सकता है.